Saturday, July 21, 2012

कम्पूटर के लिये सर्वोत्तम भाषा : संस्कृत - 'रिक ब्रिग्ज़'

कम्पूटर के लिये सर्वोत्तम भाषा : संस्कृत - 'रिक ब्रिग्ज़' नासा के एक वैज्ञानिक रिक ब्रिग्ज़ का एक लेख 'ए आई' ( आर्टिफ़िशल इंटैलिजैन्स्, कृत्रिम् बुद्धि) पत्रिका में १९८५ में‌ प्रकाशित हुआ है जिसमें उऩ्होंने घोषणा की है : “कम्पूटर के लिये सर्वोत्तम भाषा संस्कृत है"। कम्पूटर की क्रियाओं के लिये कम्प्यूटर के अन्दर एक भाषा की आवश्यकता होती है जो गणितीय तथा अत्यंत परिशुद्ध होती है। इस भाषा से 'बात' करने के लिये कम्प्यूटर क्रमादेशकों (प्रोग्रामर्स) को एक प्रचलित (स्वाभाविक )भाषा की आवश्यकता होती है जो उसके दैनंदिन कार्य की भाषा तो होती है किन्तु उसका भी परिव्हुद्ध होना अनिवार्य होता है अन्यथा कम्प्यूटर उसकी बात को गलत समझ सकता है। पिछले बीसेक वर्षों से एक ऐसी परिशुद्ध स्वाभाविक भाषा का विकास करने का विपुल व्यय के साथ भरसक प्रयत्न किया जा रहा है जिससे क्रमादेशक अपनी बात कम्प्यूटर को सुस्पष्ट अभिव्यक्त कर सके । एतदर्थ स्वाभाविक भाषाओं के शब्दार्थ - विज्ञान तथा वाक्य रचना को संवर्धित किया जा रहा था। किन्तु तार्किक डेटा के सम्प्रेषण हेतु यह प्रयास न केवल दुरूह साबित हो रहे थे वरन अस्पष्ट भी थे । अतएव यह विश्वास संपुष्ट हो रहा था कि स्वाभाविक भाषाएं कृत्रिम भाषाओं के समान गणितीय यथार्थता तथा आवश्यक परिशुद्धता के साथ बहुत से विचारों को सम्प्रेषित नहीं कर सकतीं। वास्तव में भाषा विज्ञान तथा कृत्रिम बुद्धि के बीच यह विभाजन वाली सोच ही गलत है। क्योंकि बिना ऐसे विभाजन के कम से कम एक स्वाभाविक भाषा ऐसी है जो लगभग १००० वर्ष की अवधि तक जीवन्त सम्प्रेषण की भाषा रही है और जिसके पास अपना विपुल साहित्य भी है; वह है संस्कृत भाषा। साहित्यिक समृद्धि के साथ इस भाषा में दार्शनिक तथा व्याकरणीय साहित्य की परम्परा भी इस शताब्दी तक सशक्त रूप से सतत कार्यशील रही है। संस्कृत भाषा में‌ पदान्वय करने की एक विधि है जो कृत्रिम बुद्धि में आज की ऐसी क्षमता के न केवल कार्य में वरन उसके रूप में भी बराबर है; यह अनोखी उपलब्धि संस्कृत भाषा के वैयाकरणों की अनेक उपलब्धियों में से एक है। यह लेख दर्शाता है कि स्वाभाविक भाषा कृत्रिम भाषा की तरह भी कार्य कर सकती है, तथा कृत्रिम बुद्धि में बहुत सा अन्वेषण कार्य एक सहस्राब्दि पुराने आविष्कार को एक चक्र के पुनराविष्कार की तरह कर रहा है। रिक ब्रिग्ज़ आगे लिखते हैं कि संस्कृत अद्भुत समृद्ध, उत्फ़ुल्ल तथा सभी प्रकार के विपुल विकास से युक्त भाषा है, और तब भी यह परिशुद्ध है, और २००० वर्ष पुरानी पाणिनि रचित व्याकरण के अनुशासन में रहने वाली भाषा है। इसका विस्तार हुआ, इसने अपनी समृद्धि को बढ़ाया, परिपूर्णता की ओर अग्रसर हुई और अलंकृत हुई, किन्तु हमेशा ही अपने मूल से संबद्ध रही। प्राचीन भारतीयों ने ध्वनि को बहुत महत्व दिया, और इसीलिये उनके लेखन, काव्य या गद्य, में लयात्मकता तथा सांगीतिक गुण थे । आधुनिक भारतीय भाषाएं संस्कृत की संतान हैं, और उनकी शब्दावली तथा अभिव्यक्ति के रूप इससे समानता रखते हैं। संस्कृत के वैयाकरणों का ध्येय एक ऐसी निर्दोष सम्पूर्ण भाषा का निर्माण था, जिसे 'विकास' की आवश्यकता नहीं होगी, जो किसी एक की‌ भाषा नहीं होगी, और इसीलिये वह सभी की होगी, और वह सभी मनुष्यों के लिये, तीनों कालों में सम्प्रेषण तथा संस्कृति का माध्यम या उपकरण होगी ।" जवाहरलाल नेहरू ने भी लिखा है :- ”यदि मुझसे कोई पूछे कि भारत का सर्वाधिक मूल्यवान रत्नकोश क्या है, मैं बिना किसी झिझक के उत्तर दूंगा कि वह संस्कृत भाषा है, और उसका साहित्य है तथा वह सब कुछ जो उसमें समाहित है। वह गौरवपूर्ण भव्य विरासत है,और जब तक इसका अस्तित्व है, जब तक यह हमारी जनता के जीवन को प्रभावित करती रहेगी, तब तक यह भारत की मूल सृजनशीलता जीवंत रहेगी। . . . . भारत ने एक गौरवपूर्ण भव्य भाषा - संस्कृत - का निर्माण किया, और इस भाषा, और इसकी‌ कलाएं और स्थापत्य के द्वारा इसने सुदूर विदेशों को अपने जीवंत संदेश भेजे ।" प्रसिद्ध भाषाविद तथा संस्कृत पंडित विलियम जोन्स ने भी लिखा है :- “संस्कृत भाषा की संरचना अद्भुत है; ग्रीक भाषा से अधिक निर्दोष तथा संपूर्ण; लातिनी‌ भाषा से अधिक प्रचुर तथा इन दोनों से अधिक उत्कृष्टरूप से परिष्कृत। एक और भाषाविद तथा विद्वान विलियम कुक टेलर ने लिखा है :- “ यह तो एक अचंभा करने वाली खोज हुई कि विभिन्न राज्यों के परिवर्तनों तथा उनकी विविधताओं के होते हुए भी, भारत में एक ऐसी‌ भाषा थी जो यूरोप की‌ सभी बोलियों की जननी है। इन बोलियों की जिऩ्हें हम उत्कृष्ट कहते हैं - ग्रीक भाषा की नमनीयता तथा रोमन भाषा की शक्ति - इन दोनों की वह स्रोत है। उसका दर्शन यदि आयु की दृष्टि से देखें तब पाइथोगोरस की शिक्षा तो कल की बच्ची है, और निर्भय चिन्तन की दृष्टि से प्लेटो के अत्यंत साहसिक प्रयास तो शक्तिहीन और अत्यंत साधारण हैं। उसका काव्य शुद्ध बौद्धिकता की दृष्टि से हमारे काव्य से न केवल श्रेष्ठतर है वरन उसकी कल्पना भी हमसे परे थी। उनके विज्ञान की पुरातनता हमारी ब्रह्माण्डीय गणनाओं को भी चकरा दे । अपने भीमकाय विस्तार में उसके इस साहित्य ने, जिसका वर्णन हम बिना आडंबर तथा अतिशयोक्ति के शायद ही कर सकें, अपना स्थान बनाया - वह मात्र अकेला खड़ा रहा, और अकेल्ले खड़े रहने में समर्थ था।" जार्ज इफ़्राह :- "संस्कृत का अर्थ ही होता है संपन्न, सम्पूर्ण तथा निश्चयात्मक। वास्तव में यह भाषा अत्यंत विस्तृत, मानों कि कृत्रिम, तथा ध्यान के विभिन्न स्तरों, चेतना की स्थितियों तथा मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक प्रक्रियाओं के वर्णन करने में समर्थ है। और इसके शब्दकोश की समृद्धि बहुत महत्वपूर्ण और वैविध्यपूर्ण है। संस्कृत भाषा ने शताब्दियॊं छन्दशास्त्र तथा काव्यशास्त्र के विभिन्न नियमों को प्रशंसनीय रूप से आधार दिया है। इस तरह हम देख सकते हैं कि समस्त भारतीय संस्कृति तथा संस्कृत साहित्य में‌ काव्य ने प्रबल कार्य किया है।" एम. मौनियेर वोलियम्स : - "यद्यपि भारत में ५०० बोलियां‌ हैं, किन्तु एक ही पावन भाषा है और केवल एक ही पावन साहित्य जो कि समस्त हिन्दुओं द्वारा स्वीकृत तथा पूजित है, चाहे वे कितनी ही जातियों में, बोलियों में, प्रतिष्ठा में तथा आस्थाओं में‌ कितने ही भिन्न क्यों न हों। वह भाषा संस्कृत है और संस्कृत साहित्य जो अकेला वेदों का तथा सबसे व्यापक अर्थ में ज्ञान का भंडार है, जिसमें हिंदू पुराण, दर्शन, विधि सम्मिलित हैं, साथ ही यह सम्पूर्ण धर्म का, विचारों और प्रथाओं और व्यवहारों का दर्पण है, और यह मात्र एक खदान है जिसमें से सभी भारतीय भाषाओं को समुन्नत करने के लिये या मह्त्वपूर्ण धार्मिक तथा वैज्ञानिक विचारों की अभिव्यक्ति के लिये उपयुक्त सामग्री खनन की जा सकती‌ है।" सर विलियम विल्सन हंटर :- “कथनों की परिशुद्धता, और भाषाई धातुओं के सम्पूर्ण विश्लेषण तथा शब्दों के निर्माण के सिद्धान्तों के लिये विश्व की व्याकरणों में पाणिनि की‌ व्याकरण सर्वश्रेष्ठ है। बीज गणितीय शब्दावली के उपयोग के द्वारा इसने सूत्रों अर्थात संक्षिप्त एवं सारगर्भित कथनों में अभिव्यक्ति की जो कला निर्मित की है वह संक्षिप्तिकरण में अद्वितीय है, यद्यपि कभी‌ कभार दुर्बोध होती है। यह (पाणिनीय व्याकरण) सम्पूर्ण घटनाओं को, जो संस्कृत भाषा में‌ प्रस्तुत की जाती हैं, तार्किक समस्वरता में आयोजित करती है, और यह हमारे आविष्कारों तथा उद्यमों द्वारा प्राप्त भव्यतम उपब्धियों में से एक है।" अल्ब्रेख्ट वैबर :- “हम एकदम से भव्य भवन में प्रवेश करते हैं जिसके वास्तुशिल्पी का नाम पाणिनि है तथा इस भवन में से जो भी जाता है वह इसके आद्भुत्य से प्रभावित हुए बिना तथा प्रशंसा किये बिना रह नहीं रहता। भाषा जितनी भी‌ घटनाओं की अभिव्यक्ति कर सकती है इस व्याकरण में उसके लिये पूर्ण क्षमता है, यह क्षमता उसके अविष्कारक की अद्भुत विदग्धता तथा उसकी भाषा के सम्पूर्ण क्षेत्र की गहरी पकड़ दर्शाती है।" लैनर्ड ब्लूमफ़ील्ड :- भारत में ऐसा ज्ञान उपजा जिसकी नियति भाषा संबन्धी यूरोपीय अवधारणाओं में क्रान्ति पैदा करना थी। हिन्दू व्याकरण ने यूरोपियों को वाणी के रूपों का विश्लेषण करना सिखलाया। वाल्टर यूजीन क्लार्क :- पणिनीय व्याकरण विश्व की सर्वप्रथम वैज्ञानिक व्याकरण है; प्रचलित व्याकरणों में सबसे पुरातन है, और महानतमों में से एक है। यह तो अठारहवीं शती‌ के अंत में पश्चिम द्वारा की गई संस्कृत की खोज है, तथा हमारे द्वारा भाषा के विश्लेषण करने की भारतीय विधियों के अध्ययन की‌ कि जिसने हमारे भाषा तथा व्याकरण के अध्ययन में क्रान्ति ला दी; तथा इससे हमारे तुलनात्मक भाषा विज्ञान का जन्म हुआ। . . . भारत में‌ भाषा का अध्ययन यूनान या रोम से कहीं अधिक वस्तुपरक तथा वैज्ञानिक था। वे दर्शन तथा वाक्यरचना संबन्धों के स्थान पर भाषा के अनुभवजन्य विश्लेषण में‌ अधिक रुचि रखते थे । भाषा का भारतीय अध्ययन उतना ही वस्तुपरक था जितनी किसी शरीर विज्ञानी द्वारा शरीर की चीरफ़ाड़।" अत: हमारा परम कर्तव्य बनता है कि हम अपनी सर्वश्रेष्ठ धरोहर तथा विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा संस्कृत को बचाएं; साथ ही संस्कृति की रक्षा करने के लिये भारतीय भाषाओं को बचाएं। नौकरी के लिये अंग्रेज़ी सीखें, किन्तु जीवन की, मानवता की रक्षा करने के लिये भारतीय भाषाओं में जीवन जियें। Anal Kumar, TGT (Sanskrit),Kendriya Vidyalaya No.1, Patiala (PB)

Saturday, May 5, 2012

विदेशी भाषाओं के नाम पर संस्कृत की उपेक्षा

सस्कृत मात्र भारत की प्राचीन भाषा ही नहीं, देश की आत्मा भी है। यह देश का गौरव भी है, इस सत्य को देशी और विदेशी विद्वानों ने स्वीकार किया है। वहीं यह भी शाश्वत सत्य है कि बगैर संस्कृत भाषा के ज्ञान के भारतीय संस्कृति को नहीं समझा जा सकता। इस बात को केवल भारतीय विद्वान ही नहीं, अपितु विदेशी विद्वान भी मानते हैं। विदेशी विद्वानों में मैक्समूलर एक ऐसा नाम है, जिन्होंने संस्कृत-साहित्य को आत्मसात करके संस्कृत की कई पुस्तकों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया। आज अनेक देशों में संस्कृत को विशेषत: पढ़ा और पढ़ाया जा रहा है। जर्मनी, अमेरिका, ब्रिटेन आदि देशों में पिछले कुछ वर्षों में संस्कृत के प्रति लोगों की रुचि बढ़ी है। ऐसे में यह बेहद शर्मसार करने वाला विषय है कि हमारे देश की सरकार ने विद्यालयों से संस्कृत भाषा के वजूद को मिटाने की जैसे ठान ही ली है। तभी तो गत दिनों केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने निर्णय लिया है कि केन्द्रीय विद्यालयों में फ्रेंच व जर्मन भाषा भी पढ़ाई जाए। वैसे किसी भी विदेशी भाषा का ज्ञान होना अच्छी बात है, पर अपनी सांस्कृतिक और प्राचीन भाषा की आहुति देकर नहीं। सरकार के इस फैसले से लगता है कि अपने ही देश में, अपनों के ही बीच संस्कृत अनिवार्य नहीं, महज विकल्प भाषा बनकर रह जाएगी। वैसे वर्तमान में केन्द्रीय विद्यालयों में कक्षा 6 से 8 तक संस्कृत अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई जा रही है, किन्तु जर्मन व फेंच पढ़ाने के लिए संस्कृत की अनिवार्यता समाप्त कर दी जाएगी। बच्चों के सामने विकल्प होगा कि वे संस्कृत के स्थान पर जर्मन या प्रफेंच पढ़ सकते हैं। किन्तु कई विद्यालयों में संस्कृत को किनारे कर प्रफेंच या जर्मन भाषा थोपी जा रही है। वह भी उन छात्रों पर, जो किसी कक्षा के सेक्शन-ए में हैं। क्योंकि इस सेक्शन में मेधावी छात्र होते हैं। अन्य सेक्शन के बच्चों के साथ ऐसा नहीं किया जा रहा है। यानी देशी और विदेशी भाषा के नाम पर विद्यार्थियों को आपस में बांटा जा रहा है। दिल्ली स्थित एक केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ने वाले छठी कक्षा के एक छात्र, जो सेक्शन ए में था, पर जबर्दस्ती जर्मन भाषा थोपी गई तो उसके अभिभावक ने इसका मुखर होकर विरोध किया और बच्चे को संस्कृत पढ़ाने पर जोर दिया। तब विद्यालय प्रशासन ने उनकी बात मान तो ली, किन्तु उस बच्चे को सेक्शन ए से सेक्शन बी में भेज दिया गया। सरकार के इस कदम पर दिल्ली के जनकपुरी क्षेत्र में स्थित राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के कुलपति डा. राधावल्लभ त्रिपाठी कहना है कि सरकार के इस निर्णय से संस्कृत को अपूरणीय क्षति होगी। कोई भी विदेशी भाषा संस्कृत के विकल्प के रूप नहीं पढ़ाई जानी चाहिए। लोग संस्कृत को पुरातनता का प्रतीक मानते हैं, जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं। लोगों में यह भी गलत धारणा है कि संस्कृत पढ़ने से जीवन में आगे बढ़ने के अवसर कम हो जाते हैं। इस हालत में संस्कृत को वैकल्पिक भाषा के रूप में शामिल करने से हमारे बच्चे अपनी प्राचीन भाषा से कट जाएंगे। आने वाले समय में देश पर इसका बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ेगा। इस विषय पर संस्कृत भारती के अखिल भारतीय मंत्री श्री श्रीश देवपुजारी का कहना है कि भारत में जर्मन एवं फ्रेंच भाषा के शिक्षक बहुत कम हैं, जबकि संस्कृत शिक्षक पर्याप्त हैं। फिर भी बच्चों को जर्मन या प्रफेंच पढ़ने के लिए बाध्य किया जा रहा है, और जो संस्कृत शिक्षक विभिन्न विद्यालयों में कार्यरत हैं, उन्हें नौकरी से बाहर करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। दिल्ली में इस षडयंत्र की शिकार होते-होते बची हैं, दिल्ली के एक प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका। हुआ यूं कि गत अप्रैल के प्रथम सप्ताह में विद्यालय प्रशासन ने इन्हें यह कहकर नौकरी से बाहर कर दिया कि अब इनकी जरूरत विद्यालय को नहीं है, क्योंकि बच्चे संस्कृत के स्थान पर प्रफेंच पढ़ेंगे। विरोधस्वरूप शिक्षिका ने विद्यालय के सामने धरना दिया। उनका साथ विद्यालय के उन छात्रों ने भी दिया, जो प्रफेंच नहीं, संस्कृत पढ़ना चाहते थे। धरना-प्रदर्शन करीब एक सप्ताह तक चला, इसके बाद विद्यालय प्रशासन ने अपना निर्णय बदल लिया और उन्हें नौकरी में वापस ले लिया गया है। संप्रग सरकार प्राचीन भाषा संस्कृत और राष्ट्र भाषा हिन्दी के प्रति सौतेला व्यवहार भी कर रही है। सरकार ने वर्ष 2011-12 के बजट में भाषाओं के विकास के लिए अलग से धनराशि उपलब्ध कराई है। सरकार ने पूरे देश में हिन्दी के विकास के लिए मात्र 50 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। संस्कृत के विकास के लिए तो एक पैसा भी खर्च करना सरकार को ठीक नहीं लगा। इसके विपरीत अरबी भाषा के विकास के लिए 100 करोड़ रुपये केवल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को उपलब्ध कराये हैं। संस्कृत भाषा की स्थिति ऐसी है तो समझा जा सकता है कि इसके शिक्षकों की स्थिति भी सुखद नहीं होगी। वर्तमान में देशभर के केन्द्रीय विद्यालयों में कुल 25 सौ संस्कृत भाषा के शिक्षक हैं। इनमें से अधिकतर की पदोन्नति नहीं हो रही है। संस्कृत का कोई शिक्षक टी.जी.टी. के रूप में नौकरी शुरू करता है और टी.जी.टी. के पद पर ही सेवानिवृत्ता भी हो जाता है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि केन्द्रीय विद्यालयों में कक्षा 8 से आगे संस्कृत ऐच्छिक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। ऐच्छिक विषय होने के कारण बहुत कम छात्र संस्कृत पढ़ते हैं। सरकार का तर्क है कि जब बड़ी कक्षाओं में संस्कृत का पठन-पाठन बहुत ही कम है, तो फिर किसी संस्कृत शिक्षक की पदोन्नति क्यों हो? इस कारण केन्द्रीय विद्यालयों में संस्कृत विषय में कोई पी.जी.टी. है ही नहीं। इन्हें समयानुसार वेतनमान तो मिल जाता है, पर पद नहीं मिल पाता। कुछ समय पूर्व यह जरूर किया गया है कि यदि किसी संस्कृत शिक्षक के पास स्नातकोत्तार हिन्दी की उपाधि होती है, तो उसे पी.जी.टी. का पद देकर हिन्दी शिक्षक बना दिया जाता है। सरकार ने संस्कृत को स्कूलों की चाहरदीवारी से बाहर करने के लिए एक और कदम उठाया है। केन्द्रीय अध्यापक पात्रता परीक्षा में संस्कृत को नहीं रखा गया है। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष से केन्द्र स्तर पर केन्द्रीय अध्यापक पात्रता परीक्षा और राज्य स्तर पर राज्य अध्यापक पात्रता परीक्षा का प्रावधान किया गया है। केन्द्रीय अध्यापक पात्रता परीक्षा केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सी.बी.एस.ई.) की देखरेख में होगी। इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाला ही किसी केन्द्रीय विद्यालय या केन्द्र सरकार द्वारा संचालित अन्य विद्यालयों में शिक्षक बनने के लिए आवेदन कर सकता है। किन्तु इस परीक्षा में संस्कृत को शामिल नहीं किया गया है। इससे साफ है कि आगे से केन्द्र सरकार के अन्य विद्यालयों और केन्द्रीय विद्यालयों में संस्कृत शिक्षक की नियुक्ति भी नहीं हो पाएगी। इस तरह सरकार ने संस्कृत को अब अपने अधीन विद्यालयों से विदाई करने की पूरी तैयारी कर ली है। अगर सरकार की यही नीयत रही और विदेशों में संस्कृत के प्रति बढ़ती रुचि की गति ऐसे ही जारी रही तो यह भी हो सकता है कि आने वाले समय में अपने ही देश के लोगों को संस्कृत पढ़ने के लिए विदेश जाना पड़े। सौजन्य : लिंक

संस्कृत हटाने की साज़िश

 शायद विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत में मंदिरों और शहरों के ध्वंस, दिल्ली में अठारह बार जनसंहार और तक्षशिला-नालंदा के विराट ग्रंथागार जलाने के बाद गाजी होने के जो खिताब पाए थे, उससे बढ़ कर अपना मुकद्दस फर्ज अदा करने की कोशिश सल्तनते-हिंदुस्तान के भूरे-काले या चितकबरे अंग्रेज कर रहे हैं। दुनिया में हर कोई इस बात पर यकीन करेगा कि अगर इस दुनिया के ओर-छोर में कोई ऐसा देश होगा, जहां संस्कृत को खत्म करने की अंतिम निर्णायक कोशिश नहीं होने दी जाएगी, तो वह देश सिर्फ भारतवर्ष हो सकता है। एक पवित्र, पावन सांस्कृतिक परंपरा, राष्ट्रीयता के इतिहास, हजारों वर्ष पुराने समाज के आरोह-अवरोह, संघर्षों और विजय गाथाओं को अपरिमित परिमाण में अपने अंक में समेटे एकमात्र वह भाषा, जो विज्ञान के आधुनिकतम मानदंडों पर खरी और शब्द संसार के उच्चतम शिखरों को भी उच्चतर बनाने में सक्षम मानी जाती है। इसका परिचय ही मनुष्य को देवत्व की ओर ले चलता है। पूजा-पाठ वाला देवत्व नहीं, बल्कि अपने विचार, कर्म और साधना के धरातल पर जीवंत हो उठने वाला वह मनुष्यत्व, जो देवत्व को भी ईर्ष्या से दग्ध कर दे। वह संस्कृत, जो हर उस हिंदू के जन्म से मृत्यु तक के हर संस्कार और संवाद का अपरिहार्य अंग होती है, चाहे वह आस्थावादी हो या अनास्थावादी; उसका अंत करने का प्रयास वही कर रहे हैं, जिनकी मृत्यु के समय संस्कृत में ही मंत्र पढ़ते हुए मुखाग्नि दी जानी है। 
पहले सीबीएसई के अंतर्गत आने वाले विद्यालयों में त्रिभाषा सूत्र इस प्रकार लादा गया कि संस्कृत हटा कर उसकी जगह अंग्रेजी आ जाए। कारण कोई भी रहे, लेकिन हम सब किसी न किसी स्तर पर संस्कृत पढ़ कर ही बड़े हुए। जिन प्रांतों में हिंदी का विरोध है, जैसे तमिलनाडु या केरल, वहां भी संस्कृत विरोधहीन वातावरण में पढ़ी गई। जहां के पुजारी हिंदी में बात नहीं कर पाते वे धाराप्रवाह संस्कृत में व्याख्यान देते हैं और आसेतु हिमाचल ही संस्कृत संपूर्ण भारतीय समाज को एक सांस्कृतिक धागे से नहीं जोड़ती, बल्कि चीन, जापान, कांबोज से लेकर ईरान और लातिन अमेरिका में पाए जाने वाले प्राचीन अभिलेखों में मिले संस्कृत शब्द हमें उन देशों से अनायास जोड़ते हुए वसुधैव कुटुंबकम् का दृश्य आंखों के सामने साक्षात जीवंत कर देते हैं।
उस संस्कृत को आज उन पाठ्यक्रमों और शिक्षा क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों से काट कर अलग किया जा रहा है, जहां वर्षों से उसकी उपस्थिति का कभी किसी वर्ग ने, किसी बहाने से भी, विरोध नहीं किया था।
सीबीएसई में अंग्रेजी और विदेशी भाषाओं के लिए जब जगह बनाने की आवश्यकता हुई, तो केवल संस्कृत को हटना पड़ा।
अब केंद्रीय विद्यालय संगठनों में निर्देश दिए गए हैं कि संस्कृत के साथ जर्मन, चीनी और फ्रांसीसी भाषा पढ़ने का विकल्प शामिल किया जाए और भले संस्कृत पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए अध्यापक न हों, लेकिन कम संख्या में भी अगर विद्यार्थी जर्मन पढ़ना चाहें तो उनके लिए विशेष व्यवस्था की जाए और छात्रों को जर्मन, चीनी, फ्रांसीसी सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। अभी तक छठी से आठवीं तक प्रत्येक क्षेत्र के केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत अनिवार्य थी। नवीं में विकल्प दिया जाता था कि संस्कृत या कोई और विषय ले लिया जाए। 
अब संस्कृत छठी से आठवीं तक जर्मन, चीनी और फ्रांसीसी के समकक्ष रख दी गई है, जिसका एक ही अर्थ निकलता है कि सरकार संस्कृत को विदेशी भाषाओं के समान रख कर खुले तौर पर निर्देश देते हुए छात्रों और अध्यापकों को विदेशी भाषा सीखने की ओर बढ़ाना चाहती है। केंद्रीय विद्यालय के आयुक्त या उन आयुक्त को निर्देश देने वाले नेता और सत्ता पक्ष के नियंत्रक निश्चित रूप से उन लोगों में से आते हैं, जो समाज में तथाकथित उच्च जाति के, और जहां तक नाम और उनके प्रमाण-पत्रों का प्रश्न है, हिंदू कहे जाते हैं। 
इनसे बढ़ कर संस्कृत की हत्या करने वाला और कौन होगा, जो निर्लज्जता से न केवल संस्कृत के विश्वविद्यालयों को उपेक्षित करता, बल्कि संस्कृत में रोजगार के अत्यंत कम अवसर होने के बावजूद परंपरा से संस्कृत पढ़ने और पढ़ाने वालों को निरादृत करते हुए अब संस्कृत को विद्यालयीन शिक्षा क्षेत्र से भी निकाल बाहर कर रहा है।
ये धन्य हैं।
शायद ही किसी को इस बात से आपत्ति हो कि जर्मन भाषा या चीनी और फ्रांसीसी पढ़ी जाए।  लेकिन क्या वह संस्कृत की कीमत पर होना चाहिए? क्या अपनी मातृभूमि और विदेशी भूमि को हम एक जैसा मान सकते हैं? अगर धन, वैभव और अंतरराष्ट्रीय सुविधाओं और सम्मान के लिए विदेशी भाषाएं अपने देश की सांस्कृतिक धरोहर और स्वदेशी सम्मान से ज्यादा बड़ी मान ली गई हैं, तो फिर अंग्रेजों के खिलाफ भी लड़ने की क्या जरूरत थी? 
वैसे भी भारत में गोमाता की पूजा के जितने भी ढकोसले चलते हों, सर्वाधिक गो-हत्या कर गो-मांस का व्यापार करने वालों में तथाकथित उच्च जाति के हिंदुओं का ही नाम बड़े पैमाने पर आता है। वे भी धन्य हैं।
केवल संस्कृत नहीं, हिंदी भी अखबारों के कुछ ज्यादा ही पढ़े-लिखे, मालिक-संपादक अपने समाचारों और स्तंभों में अंग्रेजी के अस्वीकार्य और जुगुप्साजनक प्रयोग से क्षत-विक्षत कर रहे हैं। सरकार भी अपने संस्थानों में हिंदी खत्म करने पर तुली है।  हिंदी के बिना सब कुछ चलता है और हिंदी में वोट लेने की मजबूरी थोड़ी-बहुत निभा लेने के बाद हिंदी को बिना किसी सरकारी हानि की आशंका से आराम से लतियाया जा सकता है। संसद सांस्कृतिक हानि के प्रति चिंतित होगी, यह देखना बाकी है। 
बैंकों में कितने गजनवीपन से सरकार हिंदी के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त कर रही है, इसका विवरण तनिक देखिए। 
विभिन्न सरकारी बैंकों में राजभाषा अधिकारी पद की जितनी रिक्तियां होती हैं, उन्हें भरा नहीं जा रहा है और प्रार्थियों की योग्यताओं में से संस्कृत हटा कर अंग्रेजी जोड़ी जा रही है। 2009 में यूको बैंक में अठारह राजभाषा अधिकारी नियुक्त किए जाने की विज्ञप्ति निकली थी, लेकिन अंतिम रूप से केवल आठ का चयन किया गया और वह भी अंग्रेजी की जानकारी अनिवार्य करने के बाद। 2009 के बाद यूको बैंक में किसी राजभाषा अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई, ऐसी जानकारी है। 
इंडियन बैंक में 2009 में तेरह राजभाषा अधिकारियों की नियुक्ति की विज्ञप्ति निकाली गई थी, लेकिन केवल एक पद पर नियुक्ति की गई और बारह पदों पर क्यों नियुक्ति नहीं की गई, इसका भी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। पंजाब ऐंड सिंध बैंक में 2010 की विज्ञप्ति के अनुसार राजभाषा अधिकारी के दस पद रिक्त थे, लेकिन एक भी नियुक्ति नहीं की गई। आंध्र बैंक में 2011 की विज्ञप्ति के अनुसार दस राजभाषा अधिकारी के पद रिक्त थे, पर एक भी नियुक्ति नहीं की गई। पंजाब नेशनल बैंक में 2011 की विज्ञप्ति के अनुसार इक्यावन पद रिक्त थे, लेकिन केवल एक नियुक्ति का समाचार है। हिंदी और संस्कृत में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री होने के बावजूद बैंक कहते हैं कि अंग्रेजी की डिग्री लाओ तब आपको हिंदी अधिकारी के नाते नियुक्ति मिलेगी।
इस परिस्थिति में रोने की भी जगह नहीं बचती।

Saturday, April 21, 2012

विदेशी भाषा की चाह में भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत की हत्या

विदेशी भाषा की चाह में भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत की हत्या ऐसा लगता है कि सोनिया-मनमोहन सरकार का एकमात्र लक्ष्य है भारतीयता, भारतीय संस्कृति और सभी भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा को मिटाना। इसलिए कभी वह भारतीयता पर चोट करती है, कभी भारतीय संस्कृति के विरुद्ध कार्य करती है, तो कभी संस्कृत की 'हत्या' के लिए विदेशी भाषा रूपी शस्त्र चलाती है। संस्कृत की हत्या? जी हां, यह सरकार जिस नीति पर चल रही है उससे तो संस्कृत भाषा एक-दो साल में तड़प-तड़प कर अपने प्राण त्याग देगी। उल्लेखनीय है कि देश के सभी 987 केन्द्रीय विद्यालयों में कक्षा 6 से 8 तक संस्कृत भाषा अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाती है। किन्तु 4 अप्रैल, 2012 को सरकार ने संस्कृत पढ़ाने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। अब बच्चे संस्कृत की जगह फ्रेंच और जर्मन भी पढ़ सकेंगे। दिल्ली और उसके आस-पास तथा कुछ अन्य महानगरों के केन्द्रीय विद्यालयों में जर्मन और फ्रेंच की पढ़ाई भी शुरू हो गई है। संस्कृत के अध्ययन की अनिवार्यता समाप्त होने और विदेशी भाषा की चाह के कारण अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों को संस्कृत के स्थान पर फ्रेंच या जर्मन पढ़ने को कह रहे हैं। संस्कृत-सेवियों का मानना है कि भारतीयों पर चढ़ा विदेशी भाषा का यह भूत संस्कृत की 'हत्या' कर देगा। संस्कृत-सेवियों का कहना है विदेशी भाषा की आड़ में यह सरकार संस्कृत को पूरी तरह समाप्त करने पर तुली है। संस्कृत हमारी प्राचीन भाषा (संस्कृत बनेगी नासा की भाषा) है। दुनिया के अन्य देश अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और भाषा को बचाने के लिए कटिबद्ध हैं, जबकि भारत में प्राचीन भाषा संस्कृत की पढ़ाई तक बन्द की जा रही है। लोग प्रश्न कर रहे हैं कि केन्द्रीय विद्यालयों में अभी फ्रेंच और जर्मन के शिक्षक भी उपलब्ध नहीं हैं, फिर उन्हें पढ़ाने की जल्दबाजी क्यों की जा रही? जबकि सभी केन्द्रीय विद्यालयों में संस्कृत के योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध हैं। केन्द्रीय विद्यालयों पर कड़ी नजर रखने वाले एक विद्वान ने बताया कि फ्रेंच और जर्मन की अभी न तो पुस्तकें ही उपलब्ध हैं और न ही पाठ्यक्रम। अभी दिल्ली और आसपास के केन्द्रीय विद्यालयों में फ्रेंच और जर्मन जो लोग पढ़ा रहे हैं, उनके पास अपेक्षित उपाधियां भी नहीं हैं। इनमें से अधिकांश के पास नई दिल्ली के भारतीय विद्या भवन और मैक्समूलर भवन से फ्रेंच या जर्मन में छह-छह महीने का पाठ्यक्रम पूरा करने का डिप्लोमा है। यह डिप्लोमा बारहवीं उत्तीर्ण कोई भी विद्यार्थी प्राप्त कर सकता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जर्मन और फ्रेंच में बी.ए. कराता है। हो सकता है फ्रेंच और जर्मन पढ़ाने वालों में किन्हीं के पास बी.ए. की उपाधि भी हो। फिर भी उसके पास शिक्षक बनने की पात्रता नहीं है। फिर उन्हें किस आधार पर केन्द्रीय विद्यालयों में पढ़ाने की अनुमति मिल रही है? केन्द्रीय विद्यालय के एक अन्य शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि फ्रेंच और जर्मन के तथाकथित शिक्षकों को विशेष सुविधाएं क्यों दी जा रही हैं? बिना तैयारी के जल्दबाजी में फ्रेंच और जर्मन की पढ़ाई शुरू तो कर दी गई है। किन्तु देश के सभी केन्द्रीय विद्यालयों में फ्रेंच और जर्मन के इतने शिक्षक कहां से आएंगे? किसी छात्र के सामने उस समय बड़ी समस्या खड़ी होगी जब वह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के किसी केन्द्रीय विद्यालय से दूर देश के किसी अन्य केन्द्रीय विद्यालय में जाएगा। उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय विद्यालयों में सरकारी सेवा में लगे लोगों के बच्चे ही मुख्य रूप से पढ़ते हैं। यदि दिल्ली में कार्यरत किसी कर्मचारी का स्थानान्तरण पटना हो जाता है तो स्वाभाविक रूप से वह अपने बच्चों को भी पटना के किसी केन्द्रीय विद्यालय में दाखिला दिलाएगा। यदि उसके बच्चे दिल्ली में फ्रेंच या जर्मन पढ़ रहे होंगे तो पटना में वह क्या पढ़ेगा? क्योंकि वहां तो इन विषयों के शिक्षक ही नहीं हैं। फिर भी पता नहीं सरकार किस दबाव में फ्रेंच और जर्मन को पढ़ाने की जल्दबाजी कर रही है। सौजन्य : Link